मेरे ह्रदय के आँगन में
कोई दीप नहीं जलता है
मेर ह्रदय के आंचल को
कोई फूल नहीं मिलता है
जब जब देखा आसमान को, किसी सितारे की आशा में
बिजली ही गिरने लगती है
सर डर कर झुकने लगता है !
सूनी आखों की पलकें फिर, अनायास नम हो जाती हैं
और विवश होकर उर मेरा
फिर क्रंदन करने लगता है
दुःख सारे सारी दुनिया के, डेरा डाल लिए हों जैसे
संसार मुझे मेरे मानस का
वैसा ही लगने लगता है !
मेरे ह्रदय की चित्रपटी, चित्र रहित-सी हो जाती है
दर्पण धुंधला हो जाता है
सुर मंदिर ढहने लगता है !


bahut sunder shavdo se bhavo kee abhivykti.
ReplyDeleteश्री मान जी........... बहुत सुन्दर सृजन किया है आपने .... एक अच्छी कविता पढने को मिली
ReplyDeletehttp://athaah.blogspot.com/
वाह! सरे जहाँ का दर्द समेट लिया है आपने अपने भीतर!
ReplyDeleteटंकण त्रुटि ..
बिजली ही गरने लगती है=बिजली ही गिरने लगती है
वैसा ही लगाने लगता है=वैसा ही लगने लगता है
मेरे प्रिय पाठकों को मेरा हार्दिक धन्यवाद.मेरे इस ब्लॉग में लिखी गईं सारी(इंग्लिश की रचनाओं को छोडकर)रचनाएँ १९७५ से पहले की हैं .उन दिनों मैं विद्यार्थी था और दिल में किसी का आना हो गया था.
ReplyDeleteजब-से ओशो का प्रेमी हो गया हूँ ,वो बातें बचकानी लगती हैं.
ऐसी कवितायें रोज रोज पढने को नहीं मिलती...इतनी भावपूर्ण कवितायें लिखने के लिए आप को बधाई...शब्द शब्द दिल में उतर गयी.
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