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Wednesday, May 26, 2010

संसार

आँखें रेगिस्तान का आसमान हो गई हैं
जलती रहती हैं ये ,बस जलती रहती हैं !
बदलियाँ नहीं छातीं ,दूर-दूर तक केवल
आंधियां गुबार ले चलती रहतीं हैं !!

कहीं कहीं उगी हैं काटों की झाडियाँ ,कहीं गिध्द बैठे हैं डैने फैलाकर !
कहीं बहती होगी ,मीठी जल-धारा भी ,दौडाती है मरीचिका यहाँ तो तरसाकर !

इजाजत नहीं यहाँ पर कहीं बैठ रोने की
हवाएं भी यहाँ कब्र गढती रहती हैं !

चाहे जितना भी चलो माहौल वही रहता है .जमी कदम-कदम पर धंसती ही जाती है
रहा-सहा खून चाहता है छलकना ,प्रतिपल प्यास और बढती ही जाती है

विश्वास टूटते हैं बिजली की तरह सर पर
आशाएं यहाँ भ्रमित करती रहती हैं !

3 comments:

  1. काफी सुन्दर शब्दों का प्रयोग किया है आपने अपनी कविताओ में सुन्दर अति सुन्दर

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  2. bahut sunder bhavo kee sashakt abhivykti ..........

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  3. विश्वास टूटते हैं बिजली की तरह सर पर
    आशाएं यहाँ भ्रमित करती रहती हैं !

    हमारी आशाओं के आधार ही गलत है आज. सुन्दर कविता!

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