आँखें रेगिस्तान का आसमान हो गई हैं
जलती रहती हैं ये ,बस जलती रहती हैं !
बदलियाँ नहीं छातीं ,दूर-दूर तक केवल
आंधियां गुबार ले चलती रहतीं हैं !!
कहीं कहीं उगी हैं काटों की झाडियाँ ,कहीं गिध्द बैठे हैं डैने फैलाकर !
कहीं बहती होगी ,मीठी जल-धारा भी ,दौडाती है मरीचिका यहाँ तो तरसाकर !
इजाजत नहीं यहाँ पर कहीं बैठ रोने की
हवाएं भी यहाँ कब्र गढती रहती हैं !
चाहे जितना भी चलो माहौल वही रहता है .जमी कदम-कदम पर धंसती ही जाती है
रहा-सहा खून चाहता है छलकना ,प्रतिपल प्यास और बढती ही जाती है
विश्वास टूटते हैं बिजली की तरह सर पर
आशाएं यहाँ भ्रमित करती रहती हैं !
Wednesday, May 26, 2010
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काफी सुन्दर शब्दों का प्रयोग किया है आपने अपनी कविताओ में सुन्दर अति सुन्दर
ReplyDeletebahut sunder bhavo kee sashakt abhivykti ..........
ReplyDeleteविश्वास टूटते हैं बिजली की तरह सर पर
ReplyDeleteआशाएं यहाँ भ्रमित करती रहती हैं !
हमारी आशाओं के आधार ही गलत है आज. सुन्दर कविता!