है कहती हर आहट वही है,वही है !
सच्चाई चीख उठती नहीं है नहीं है !
प्रतीक्ष्या में आखें कितनी विकल हैं !
कभी मुस्कुरातीं,कभी तो सजल हैं !
है होतीं ये घड़ियाँ निराली सही है !
कभी सुनाई पड़े पायल की रुनझुन,
कभी लगता है कोई करता है गुनगुन.
कभी तो लगे वो यहीं पे कहीं है !
रहा है कोई छेड़ तारों को दिल के,
उतरा हो शायद साँसों में मिल के.
या शायद वो रहता वहीं पे कहीं है !
Tuesday, August 24, 2010
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अच्छी
ReplyDeleteहै होतीं ये घड़ियाँ निराली सही है !
ReplyDelete..प्रतिक्षा में प्रेम रस की बरसात हो तो क्या कहने!