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Saturday, September 11, 2010

चार मन की बातें

संसार-सागर

ले चल रे उस पार माझी ! ले चल रे उस पार !
यहाँ लगे ना मेरा मन, लगता है जल रहा चमन !!

ना जाने कितनी चाहें हैं, राहें हैं बस राहें हैं !!

अपनों के संग भी मै अकेला, कहीं लगे ना मन का मेला !!

मंजिल का कोई दीप नहीं, इस सागर में कोई सीप नहीं !!
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कितनी गहराई !
आँख में अश्क नहीं,मुस्कान नहीं होठों पे,
ये किस तरफ को मुझे, जाता है चलाये साकी !
धडकने रुकने को हैं, पैर डगमगाते हैं,
कुछ अदाओं से मुझे,जाता है उठाये साकी !
नजरें नाकाम-सी हैं,बेहोशी-सी छायी है,
आँखों से आखें, जाता है मिलाए साकी !
रहने दो,अब मुझे,बेहोश करो,खत्म करो,
क्यों ये उम्मीदें मुझे,जाता है दिलाए साकी !
कितनी गहराई है,अब और दर्दे-सागर की,
उसको हाथों में लिये,जाता है पिलाए साकी !
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तरसते हुये
येक गोर्ज के काटों से भरे तट पर
सूखी टहनियों के येक व्रिक्ष्य को देखते हुये
मुझे यैसा लगा-
जैसे,
गिरकर वीराने के किसी तिनके पर
जिस तरह शबनम की बूदें
फिसल जाती हैं
पंखुरी के लिये तरसते हुये !
ठीक उसी तरह
मेरे आंसू की बूदें फिसल जाती हैं
इधर-उधर -
तेरे आँचल के लिये
तरसते हुये !
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रिश्ता

तुझे चुनौती देता हुआ
तेरा नाम पुकारता,खिलखिलाता
तूफ़ान चला आ रहा है !
नाव खोल और ले जा किनारे-से दूर
मझधार की ओर !
क्या कहा, भागना चाहता है ?
येक बार
तूफ़ान से जूझने का,लहरों के थपेडों में
मुस्कुराने का,
खेल, खेलकर तो देख !
बस एकबार तूफ़ान को अपनी बाहों में भर ले !
फिर वो
तेर साथी की तरह
तेरे नाव को उसपार लगाने में
तेरा साथ देगा.
और यदि,
तूफ़ान के चुनौती के वक्त
तू मरुस्थल की रेत पर है
तो जाग,और जागते हुये
रेत की दीवार को अपने ऊपर बनने दे,
मगर याद रख ! जागते हुये,
बेहोश न हो जाना.
अगर यैसा करेगा
तो तुझे मालूम हो जाएगा, वो रिश्ता
जो तूफ़ान, रेत और तेरे बीच में है.
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2 comments:

  1. .

    @--ले चल रे उस पार माझी ! ले चल रे उस पार !
    यहाँ लगे ना मेरा मन, लगता है जल रहा चमन !!

    अक्सर ऐसा होता है, जब हम निराश होते हैं तो ऐसे ख़याल मन में आते हैं। लेकिन हर समय एक सा नहीं होता। दुःख के बाद सुख आना तो निश्चित है।

    आभार,
    दिव्या।

    .

    ReplyDelete
  2. तरसते हुये
    एक गोर्ज के काटों से भरे तट पर
    सूखी टहनियों के एक वृक्ष को देखते हुए
    मुझे ऐसा लगा-
    जैसे,
    गिरकर वीराने के किसी तिनके पर
    जिस तरह शबनम की बूदें
    फिसल जाती हैं
    पंखुरी के लिये तरसते हुए !
    ठीक उसी तरह
    मेरे आंसू की बूदें फिसल जाती हैं
    इधर-उधर -
    तेरे आँचल के लिये
    तरसते हुए !

    ...दर्दनाक अभिव्यक्ति।

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