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Wednesday, September 29, 2010

पदार्थ की पूजा ....

पदार्थ की पूजा करके,थके पछताते-से हैं लोग.
विज्ञान की राह में भटके,शरमाते-से हैं लोग.

साथ कोई है नहीं,सब जी रहे हैं जुदा-जुदा !
टूटकर बिखरे हुये,मनकों के दाने-से हैं लोग.

भावनाओं-से रहित,लोग जैसे हैं मशीन !
या पड़े रस्ते में खाली पैमाने-से हैं लोग.

हो रहा है शक भी मुझको,इनकी चलती सांस पर !
अपनी-ही मौत पर मानो,शोक मनाते-से हैं लोग.

मुस्कुराते,गुनगुनाते, लोग रहते हैं कहाँ !
सौ तरीकों से यहाँ,मुह बनाते-से हैं लोग.

बमों के कारखाने,हैं सुरक्ष्या के लिये चल रहे !
और उनकी छाहं में ही,घबराते-से हैं लोग.

3 comments:

  1. वाह!!
    अतिसुन्दर भाव,क्या कहने…।
    बमों के कारखाने,हैं सु्रक्षा के लिये चल रहे !
    और उनकी छाहं में ही,घबराते-से हैं लोग.

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  2. साथ कोई है नहीं,सब जी रहे हैं जुदा-जुदा !
    टूटकर बिखरे हुये,मनकों के दाने-से हैं लोग.

    bahut sunder bhavo se shavdo kee manka peeroee hai aapne ek mala me.....
    Aabhar

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  3. बमों के कारखाने,हैं सुरक्ष्या के लिये चल रहे !
    और उनकी छाहं में ही,घबराते-से हैं लोग.
    ...वाह!

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