पदार्थ की पूजा करके,थके पछताते-से हैं लोग.
विज्ञान की राह में भटके,शरमाते-से हैं लोग.
साथ कोई है नहीं,सब जी रहे हैं जुदा-जुदा !
टूटकर बिखरे हुये,मनकों के दाने-से हैं लोग.
भावनाओं-से रहित,लोग जैसे हैं मशीन !
या पड़े रस्ते में खाली पैमाने-से हैं लोग.
हो रहा है शक भी मुझको,इनकी चलती सांस पर !
अपनी-ही मौत पर मानो,शोक मनाते-से हैं लोग.
मुस्कुराते,गुनगुनाते, लोग रहते हैं कहाँ !
सौ तरीकों से यहाँ,मुह बनाते-से हैं लोग.
बमों के कारखाने,हैं सुरक्ष्या के लिये चल रहे !
और उनकी छाहं में ही,घबराते-से हैं लोग.
Wednesday, September 29, 2010
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वाह!!
ReplyDeleteअतिसुन्दर भाव,क्या कहने…।
बमों के कारखाने,हैं सु्रक्षा के लिये चल रहे !
और उनकी छाहं में ही,घबराते-से हैं लोग.
साथ कोई है नहीं,सब जी रहे हैं जुदा-जुदा !
ReplyDeleteटूटकर बिखरे हुये,मनकों के दाने-से हैं लोग.
bahut sunder bhavo se shavdo kee manka peeroee hai aapne ek mala me.....
Aabhar
बमों के कारखाने,हैं सुरक्ष्या के लिये चल रहे !
ReplyDeleteऔर उनकी छाहं में ही,घबराते-से हैं लोग.
...वाह!