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Wednesday, September 22, 2010

दर्द दिल के द्वार पर ....

दर्द दिल के द्वार पर,दस्तक दिये क्यों जा रहा है ?
स्वरों के पाषाण क्यों ये,शुन्य-सर पे ढा रहा है ?

सागर की गहराई लिये,अश्क अब ना बह सकेंगे.
छेडने लहरों को फिर क्यों,स्मृति किरण बरसा रहा है ?

मूरत नहीं है कोई भी,मंदिर आज,मंदिर कहाँ है ?
दीप यादों के उठाकर,क्यों वंदना दोहरा रहा है ?

कल्पना-पांखी परों को खोलकर,उड़ता नहीं अब.
दूर मधुवन से मचलतीं,हवाएं क्यों ला रहा है ?

सब सुरीले साज अब,बिखरे हुये,टूटे हुये हैं.
महफ़िल के पुराने गीत क्यों,अब खंडहर में गा रहा है ?

मोह मृदु जल का मरू में,त्यागकर मृग सो रहा है.
लहर का सपना उसे फिर,ब्यर्थ क्यों दिखला रहा है ?

रेत को चूमा तडपकर,देखकर शबनम की बूदें.
आज उन होठों पे जालिम,जाने क्यों मुस्का रहा है ?

4 comments:

  1. मूरत नहीं है कोई भी,मंदिर आज,मंदिर कहाँ है ?
    दीप यादों के उठाकर,क्यों वंदना दोहरा रहा है ?
    बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  3. Nice portrayal of life's mysteries!

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