दर्द दिल के द्वार पर,दस्तक दिये क्यों जा रहा है ?
स्वरों के पाषाण क्यों ये,शुन्य-सर पे ढा रहा है ?
सागर की गहराई लिये,अश्क अब ना बह सकेंगे.
छेडने लहरों को फिर क्यों,स्मृति किरण बरसा रहा है ?
मूरत नहीं है कोई भी,मंदिर आज,मंदिर कहाँ है ?
दीप यादों के उठाकर,क्यों वंदना दोहरा रहा है ?
कल्पना-पांखी परों को खोलकर,उड़ता नहीं अब.
दूर मधुवन से मचलतीं,हवाएं क्यों ला रहा है ?
सब सुरीले साज अब,बिखरे हुये,टूटे हुये हैं.
महफ़िल के पुराने गीत क्यों,अब खंडहर में गा रहा है ?
मोह मृदु जल का मरू में,त्यागकर मृग सो रहा है.
लहर का सपना उसे फिर,ब्यर्थ क्यों दिखला रहा है ?
रेत को चूमा तडपकर,देखकर शबनम की बूदें.
आज उन होठों पे जालिम,जाने क्यों मुस्का रहा है ?
Wednesday, September 22, 2010
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मूरत नहीं है कोई भी,मंदिर आज,मंदिर कहाँ है ?
ReplyDeleteदीप यादों के उठाकर,क्यों वंदना दोहरा रहा है ?
बेहतरीन प्रस्तुति ।
bahut sundar rachna
ReplyDeletehttp://sanjaykuamr.blogspot.com/
बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
ReplyDeleteNice portrayal of life's mysteries!
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