जाल हो गई है दुनियां,जिंदगी के लिये.
और रास्ता भी नहीं,बेखुदी के लिये.
ख्खाबों में कहीं दूर उडकर तो चला जाऊं !
मगर वो नींद नही,झूठी भी खुसी के लिये.
जिससे भी मिलो,खुद को, समझदार सोचता है.
हल फिर कैसे मिले,किसी गलती के लिये.
अपने अक्ल पर सब लोग मुतमईन हैं.
है दोष किसी और का, बेअक्ली के लिये.
कहाँ है प्यार,कहाँ हैं प्यार के रिश्ते ?
लोग जीते हैं, मरने की येक घडी के लिये.
नफरत से बनी है, हर इंसान की सूरत.
नफरत की श्रीखला में इक कड़ी के लिये.
Tuesday, September 21, 2010
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बहुत खूब..वाह!
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