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Monday, October 4, 2010

तू सागर है और लहर मैं ......


तुझसे बनी और तुझमे ही
मैं समा रही हूं !

तू सागर है और लहर मैं,
हूं तेरे गीतों का स्वर मैं,
झूल-झूल पवन झूले में,
पल दो पल क्या !
आठ पहर मैं,

तेरे गीतों को गा-गाकर
आसमान को सुना रही हूं.

उठकर कभी,कभी गिरकर मैं,
सौ टुकड़ों में बिखर-बिखर मैं,
चाँद-सितारों की किरणों से,
निखर-निखर मै,संवर-संवर मैं,

सारी मादकता तेरे ही
चरणों में मैं,बिछा रही हूं !

1 comments:

  1. ओशो को नमन...
    जिसने जीने का नया सलीका दिखाया ही नहीं, सिखाने का भी भरपूर प्रयास किया।

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