
तुझसे बनी और तुझमे ही
मैं समा रही हूं !
तू सागर है और लहर मैं,
हूं तेरे गीतों का स्वर मैं,
झूल-झूल पवन झूले में,
पल दो पल क्या !
आठ पहर मैं,
तेरे गीतों को गा-गाकर
आसमान को सुना रही हूं.
उठकर कभी,कभी गिरकर मैं,
सौ टुकड़ों में बिखर-बिखर मैं,
चाँद-सितारों की किरणों से,
निखर-निखर मै,संवर-संवर मैं,
सारी मादकता तेरे ही
चरणों में मैं,बिछा रही हूं !


ओशो को नमन...
ReplyDeleteजिसने जीने का नया सलीका दिखाया ही नहीं, सिखाने का भी भरपूर प्रयास किया।