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Monday, October 4, 2010

घडी-दो शाम देता है .....


सुनो वो डूबता सूरज,क्या पैगाम देता है ?

पाती खून से लिखकर,तुम्हारे नाम देता है !

जगाकर प्यास किरणों की,कभी जो बुझ नहीं सकती,

वो साकी अरे तुमको,अंतिम जाम देता है !

आँखों को सिखाया,देखने की कला जिसने,

वही दीपक जलाने का,तुझको काम देता है !

लो अब चेत भी जाओ,वो तुम पे,तरस खाकर,

अंधेरी रात के पहले ,घडी-दो शाम देता है !

2 comments:

  1. wah kya baat hai .

    aapkee yr rachana bahut pasand aaee .

    लो अब चेत भी जाओ,वो तुम पे,तरस खाकर,

    अंधेरी रात के पहले ,घडी-दो शाम देता है !

    ine panjtiyo ne to kamaal hee kar diya........

    Aabhar

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  2. लो अब चेत भी जाओ,वो तुम पे,तरस खाकर,
    अंधेरी रात के पहले ,घडी-दो शाम देता है !
    ...प्यारी नज़्म की शानदार पंक्तियाँ।
    ...सूरज लाख चेतावनी दे मगर हमने भी तय कर लिया है..नहीं सुधरेंगे..! रात रो-रो कर गुजारेंगे..नहीं सुधरेंगे।

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