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Monday, November 22, 2010

नहीं नहीं
मुझे कोई इन्तजार नहीं
आसा की किसी भी किरण की.
मुझे मत दिखाओ
नई आशाओं का नया सूरज .
मेरी आखें
उसके वजूद को नकारती हैं.
एक ज़माना गुजर गया
मगर वो दृश्य
अभी तक
याद है मुझे
जब सूरज
मेरी आखों के सामने ही
टुकड़े-टुकड़े होकर
अन्धकार के महासागर में मिल चुका है.

तुम जिसे सूरज समझ रहे हो
वो तो उसकी
सिर्फ
परछाईं है.

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