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Thursday, November 25, 2010

सुबह का संदेष

सागर की लहेरों में देखो ,सूरज ने सोना घोल दिया,
सर ढांप के तू अब तक सोया,सपने में खोया खोया है.
जीवन के सात सुरों का स्वर,बुलबुल ने भी बोल दिया,
मरने की आशंकाओं,पड़कर तू रोया रोया है.

भरा पात्र जल का लेकर , एक प्यासा जैसे ये सोचे,
जब ये रीता हो जाएगा, तो कैसे प्यास बुझाउँगा .
इक बहार के मौसम में ,इक फूल सोच ये कुम्हलाये,
पतझड़ के आने पर जाने,मै कैसे मुस्काउंगा .

तेरी झुकी हुई पलकों को देख के यैसा लगता है,
यैसी-ही चिंता की गठरी,तूने भी शायद ढोया है.

आकास में उठतीं लहरों से,विकराल दानवी भंवरों से,
बचा-बचाकर नैया को,उस पार लगाना दूर रहा.
प्रलय कामिनी कंपन से,प्रबल विषैले दंशन से,
ना घबराकर हाथों में,पतवार उठाना दूर रहा.

उस पार की दूरी के भय से,तूने साहिल पे पड़े-पड़े,
जीवन की जितनी अवधि थी,उसमे से भी कुछ खोया है.

2 comments:

  1. बेहद सुन्दर रचना है... शायद मेरे पास शब्द नहीं है कमेंट्स के लिए...

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  2. इस गीत के भाव जीवन को वर्तमान में जीने की प्रेरणा देते हैं।
    संघर्ष करने और हार से पहले हार न मानने की सलाह देते हैं।
    ..बहुत खूब।

    मौत को देखकर
    परिंदा उड़ना भूल गया
    यही उसकी शर्मनाक मौत का
    कारण बना।

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