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Thursday, November 25, 2010

श्रीमतिजी के लिये एक कविता

फालतू में तू तनावग्रस्त है,
और कर रही है मुझको बोर तू.
बच्चों को डांटती है तू यूँ ही,
और कर रही है ब्यर्थ शोर तू.

बर्तनों को ना पटक तू जोर से,
आहिस्ते से रख तू उनको वहाँ.
सजा हुवा लगे किचेन हमारा यूँ,
कोई देखे तो कहे अहा अहा.

दुखों से संसार के तू डर नहीं,
लगा दे उन्हें प्यार की डोर तू.

झगड कर तू छोटी-छोटी बात में,
सुबह को और शाम को न यूँ गवां.
संसार में दुःख ही नहीं सुख भी बहुत,
आशाओं के जोश से तू बन जवां.

गीतों को गुनगुना तू और मुस्कुरा,
घर में बना रात को भी भोर तू.

तू नहीं बस चांदनी घर की मेरे,
तू है चांदनी मेरे मन की भी.
तू विश्व-सुन्दरी नही तो क्या हुआ,
तू बात जान ले मेरे नयन की भी.

तुझसा न कोई फूल ना चराग है,
सौंदर्य के समुद्र की ओर-छोर तू.

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