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Tuesday, December 7, 2010

शीतल आग में......

Everything is wonderful !
You know nothing,
About anything.
You are beyond body and mind,
Not only you-
But everything.

वसंत की शुरुवात में
पेड़ों में से
निकलते हुये कोमल पत्तों की
खूबसूरती में खो जाओ.

चिड़ियों की मधुर बोली में
मिल जाओ.

चट्टानों से बहती नदी के
कलकल में मिट जाओ,या
किसी रूपसी के सौंदर्य में, या
किसी बच्चे के भोलेपन में,या
आसमान में बादलों में
आँख-मिचौली करते हुये
पूर्णिमा के चाँद की गोलाई में,या
झींगुर की धीमी-धीमी आवाज में
अपने आप को
पूरी तरह मिला दो.

अस्तित्व के रहष्य की गहराइयों में
गोते लगाते हुये
अस्तित्व को इतना महसूस करो कि
तुम न रहो अलग
अस्तित्व के साथ तुम भी एक हो जाओ.
मै को गायब हो जाने दो
समर्पण की सहलाती शीतल आग में.

1 comments:

  1. समर्पण की शातल आग जले तो...
    .सुंदर दर्शन।

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