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Wednesday, December 8, 2010

साकी का है साया.....

पी के चले थे बरसों पहले,
अब तक होश न आया.
लगता है चल रही है महफ़िल,
साकी का है साया.

नील गगन के चाँद-सा चेहरा
आँचल में थे सितारे.
आँखों में गहरा सागर था
पलकें उसके किनारे.

सुन्दर से सुन्दर फूलों में
वो ही तो मुस्काया.

उसकी आहट बागीचे में,
मंदिर में और मस्जिद में.
झरनों की स्वर-लहरी में और
गाँव-शहर के घर-घर में .

उसकी अदाएं मुझको भाईं,
और तो कुछ भी न भाया.

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