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Saturday, January 1, 2011

कब इस "मैं" को बिसरेगा ?

तू चाह रहा कि तेरा गम
कोई सुनले,कोई समझे.
पर सोच अरे नादान बता
कब किसका गम तू समझेगा ?

है दुनियां एक अलग सबकी
एक घेरे में सब बंधे हुये.
देने को तेरा साथ कोई
उसमे से कैसे निकलेगा ?

दुनियां के चौराहे पर
तूने अपने को पड़ा पाया.
अपनी मर्जी से आया नहीं
ना मर्जी से तू जायेगा.

मैंने ये किया,मैंने वो किया
मैं ये,ये करने वाला हूं.
तेरी मर्जी से कुछ न यहाँ
कब इस "मैं" को बिसरेगा ?

4 comments:

  1. आपको और आपके परिवार को मेरी और मेरे परिवार की और से एक सुन्दर, सुखमय और समृद्ध नए साल की हार्दिक शुभकामना !

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  2. धन्यवाद संजय भास्करजी और पांडेयजी.

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  3. बडी सुलझी हुई बात कही है।

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