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Sunday, June 19, 2011

अगर साया भी ......

तेरी हर नवां में फुगां क्यों है ?
दर्द का अक्श अयां क्यों है ?
अश्क के दो-चार कतरों का,
उठाये बोझ सरे-मिज्गां क्यों है ?

दिल के निगारखाने में,तू ने कैसा निगार सजाया है ?
कैसे फीके-फीके रंगों से,तू ने ये निगार बनाया है ?

लोगों से भरे इस शहर में तेरा,
तन्हाई हमइना क्यों है ?

सरे राह्गुजार में यैसे,चल रहा है क्यूं बरहम सा ?
साया भी क्या मिला नहीं,खूबसूरत किसि हमदम का ?

अगर साया भी मिला है तो,
दिल का फिर यैसा समां क्यों है ?

--आदाब---

नवां :गीत का स्वर,फुगां : क्रंदन
अक्स : प्रतिबिम्ब, सरे-मिज्गां : पलकों की नोक
निगारखाना : चित्रशाला, सरेराह्गुजार : रास्ते के किनारे
बरहम : अस्त-ब्यस्त

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