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Sunday, July 17, 2011

नगरी-नगरी,गाँव-गांव में....

नगरी-नगरी,गाँव-गांव में,
सोये हुओं का जमघट है.
प्यार नहीं करता है कोई,
संसार लगे जैसे मरघट है.

बेहोसी के सागर की,
गहराई में हर कोई लगता है.
बेकार की परेशानी में,
ज़िंदा हर कोई जलता है.

भौतिकता के दावानल में
जल रहा सभी का अंतर्घट है.

मधुशाला खोला ओशो ने,
पीने चाँद लोग ही आये.
भ्रम-जाल में पतंगा जैसे,
लोग तडपते हैं भरमाये.

पीने से खाली ना होता,
ओशो का यैसा मधु-घट है.

1 comments:

  1. नगरी-नगरी,गाँव-गांव में,
    सोये हुओं का जमघट है.
    प्यार नहीं करता है कोई,
    संसार लगे जैसे मरघट ।

    सुन्दर कविता। संसार का मर्त्यलोक नाम सार्थक हुआ।

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