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Tuesday, July 19, 2011

भाई-चारा,प्रेम,मुहब्बत......

भाई-चारा,प्रेम,मुहब्बत की बगिया उजाड दिया.
भर उसमे फिर मानव ने,नफरत का कबाड़ दिया.

हैं कम्युनिज्म के मारे कितने ही लोग उधर यारों !
और इधर कितनो ही को,डेमोक्रेसी ने पछाड दिया.

धरती की छाती पर अनेक,फहराते झंडे गड़े देख,
झनकू ने घर को देश कहा,छत पर झंडा गाड दिया.

रास्र्टसंघ में नेतागण जाने कब से बोल रहे,
और एक सपने में,मैंने कान उखाड दिया.

5 comments:

  1. भारत नेपाल की राजनीतिक विकृतियों पर बेहतरीन टिपण्णी है यह ग़ज़ल .

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  2. भर उसमे फिर मानव ने,नफरत का कबाड़ दिया
    beautiful poem

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  3. धन्यवाद,मगर मेरे विचार में तो सारी दुनियां थी.

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  4. आप अपनी कविताओं का रचना काल नहीं लिखते। मुझे लगता है कि लिखा जाना चाहिए। संभवतः यह कविता 25-30 वर्ष पुरानी है लेकिन है आज भी उतनी ही प्रासंगिक।
    ..बहुत बढ़िया कविता है।

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