मेरा जिश्म है येक जाम-सा
मय-सा तू इसमे भरा हुआ !
न तो भूत का कोई ख्याल है,
न भविष्य की कोई बात है.
जो कुछ भी है अब और यहीं,
न किसि से दिल है डरा हुआ !
मेरा जिश्म ......
तू ने यैसी आग लगाईं है,
सब ब्यर्थ था,सब जल गया.
न तो नाम में कोई दम रहा,
और रूप जैसे हवा हुआ !
मेरा जिश्म ....
ये बात तो न दिमाग की,
लिखने को कुछ बांकी नहीं.
जो मेरी तरह तुझसे भरा,
पढ़ लेगा ये हंसता हुआ !
मेरा जिश्म ....
२५/८/०११
Thursday, August 25, 2011
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इस कविता के भाव का असली आनंद तो इस अवस्था को महसूस कर सकने वाले प्राणी को ही मिलेगा। हम तो सिर्फ वाह! वाह! ही कह सकते हैं।
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