भ्रूणावस्था में माँ के पेट में कितने आराम से जिंदगी की शुरुवात होती है.जितना चाहिये उतना तापक्रम रहता है हमेशा ,जो चाहिये वो ही खुराक निरंतर मिलता रहता है.कोई फ़िक्र नहीं,किसी से कोई लेना-देना नहीं,किसी के लिये कुछ करने की आवश्यकता नहीं,कोई अपने लिये कुछ करे,इसकी उम्मीद पालने की कोई जरूरत नहीं.आराम से,हाथ-पैर थोड़ा-बहुत हिलाते हुये,पलकें आहिस्ते से हिलाते हुये जिंदगी बसर होती है.
यही चैन की जिंदगी आदमी खोजता रहता है,जिंदगी भर पैदा होने के बाद भी.
मगर अपनेआप को अगर बच्चे ही की तरह आदमी ले,और बेफिक्र हो ब्रम्हांडीय-ऊर्जा के आगोश में अपने को हरहाल में छोड़ दे,जैसे वो ऊर्जा रखती है वैसे ही रहे,तो आदमी इस संसार में भी चैन से रह सकता है.जो मिले उसके प्रति ह्रदय में धन्यवाद का भाव हो,वो ऊर्जा जो करवाये उसे प्रेम पूर्वक करे तो वही आराम और शान्ति हमेशा बनी रहती है.
मेरा-तेरा का भाव मन में न आये.मेरा लड़का अछ्छा कमाने लगे,वो दुनिया में अछ्छा काम करे,मेरा नाम रोशन करे.मेरी लड़की की शादी अछ्छे घर में हो,उसका पति उसे खूब प्यार करे,वो सदा हसते-मुस्कुराते रहे,जब मइके में आये तो घर की खूब प्रशंशा करे.मैं अपनी बुढिया के साथ प्यारे से घर में आराम से रहूँ,कार में यहाँ-वहाँ जाऊं -आऊँ,बड़े प्रेम से लोगों से हाथ मिलाऊँ,अपने बच्चों का गुणगान कर पाऊँ ....आदि इछ्यायें अगर न हों तो आदमी बड़े चैन से जीवन का लुत्फ़ उठा सकता है.
खाने को भर पेट मिले और सोने को येक अच्छा बिछौना हो,तो और कुछ ज्यादे की आवश्यकता नहीं.स्वास्थ अच्छा रहे इसके लिए कुछ ब्यायाम कर ले तो खाना भी ठीक से खाया और पचाया जा सकता है,नीद भी अच्छी आ जाती है.गौतम बुद्ध ने जैसा कहा है,कि सम्यक भोजन,सम्यक श्रम,सम्यक निद्रा,सम्यक ध्यान...बस यही सब तो चाहिये येक आदमी को.
मै तो अपने आप को इस ब्रम्हांडरूपी माँ के पेट में अनुभव करता हूँ.जो जिस समय चाहिये वो मुझे देता रहता है.कितनी शान्ति है,कितना आनंद है इस जीवन में.मै देख सकता हूँ,सुन सकता हूँ,सूंघ सकता हूँ,स्वाद ले सकता हूँ और छूकर महसूस कर सकता हूँ.मैं ह्रदय में श्रद्धा के भाव से आप्लावित होकर खुसी में झूम सकता हूँ,नाच सकता हूँ मस्त संगीत में अपने शरीर को छोडकर.गा सकता हूँ प्रेम की भावनाओं से ओतप्रोत अनेक गीत भाव-विह्वल होकर.
ओ अस्तित्व ! तूने मुझसे कितना प्रेम किया है !मुझे तू ने ही तो पैदा किया,नहीं तो मै होता ही नहीं और फिर क्या-क्या कर पाने की संभावनाएं मुझे तू ने ही तो प्रदान कीं.तुझे धन्यवाद देने के लिये मेरे पास का ह्रदय तो बहुत छोटा प्रतीत होता है,जिसमे भाव समा ही नही सकते.मै अपने-आप को येक बच्चे के भ्रूण की ही की तरह पाता हूँ जो तेरे गर्भ में आनंद पूर्वक जी रहा है.
Sunday, December 18, 2011
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