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Saturday, February 18, 2012

आदमी से पशु ही श्रेष्ठ तो नहीं !

सम्पूर्ण जीव-जगत आधारभूतरूप से येक ही है.चाहे वनस्पति हो या पशु,सभीको कुछ आहार चाहिये जीवन चलाने के लिये,सभी जन्म देते हैं अपनी-ही तरह के नये जीवों को ,वनस्पति बीजों के द्वारा और पशु अंडे द्वारा या बच्चों द्वारा,सभी सांस लेते हैं जिससे ऊर्जा प्राप्त होती है.वनस्पति दो बातों में पशु से भिन्न है.येक तो वो चल-फिर नहीं सकते और दूसरे वो अपना भोजन धूप,पानी और खनिज पदार्थ के द्वारा खुद ही बना लेते हैं.ये दूसरी बात के ही कारण वो पशु से श्रेष्ठ हैं.

पशु और आदमी मुझे तो येक ही लगते हैं.केवल रूप में अंतर है.दो पैरों से आदमी चलता है पशु नहीं मगर ये तो कोई खास फरक न हुआ.पाचनतंत्र देखो तो छोटे-मोटे अंतर ही हैं,न पचे भोजन का सभी विसर्जन करते हैं,सभी फेफड़े से सांस लेते हैं,कामवासना के द्वारा संतान पैदा करते हैं,बच्चे से जवान और फिर बूढ़े होकर मर जाते हैं.

पशु और आदमी में येक बहुत बड़ी समानता है.दोनों अपना येरिया निर्धारित करते हैं.कुत्ते और बहुत से जंगली पशु अपने येरिये में किसी दूसरे को बर्दास्त नहीं करते.सभी देखते हैं कि किसी महल्ले में कोई नया कुत्ता आ जाये तो उस महल्ले के सभी कुत्ते उसे मार काटने को तैयार हो जाते हैं.इतने जोर-शोर से भूकते हैं कि जीना दूभर लगने लगता है.
आदमी ने भी तो सीमाएं बना रखी हैं दूसरों को अंदर न आने देने के लिये.देश की सीमायें हैं,घर की सीमाये हैं.भूकने की जगह आदमी ने नियम क़ानून बना रखे हैं.रंग-ढंग अलग हैं,मगर आधारभूतरूप से तो येक ही बात है.
पशु हो या आदमी जन्म लेते हैं, बच्चे से जवान फिर बूढ़े होते हैं और मरने से पहले संतान पैदा कर जाते हैं. आधारभूतरूप से येक ही तो हैं.

आदमी ने ज्ञान के द्वारा आराम से रहना सीख लिया है और पशु ये न कर सका,वो प्रकृति के द्वारा अधिक प्रभावित है.प्रकृति का अधिक शोषण करने के कारण अब आदमी खतरे में है.आदमी प्रकृति से दूर होता जा रहा है.पशु प्राकृतिक तौर से काम क्रीडा करके संतान पैदा करते हैं,क्रोध आता है तो वो क्रोधित होते हैं,जोर-जोर से चिल्लाने का मन हो तो चिल्लाते है,मगर आदमी ने सामाजिक नियम-क़ानून बना रखे हैं.चूंकि आदमी को भी प्रकृति ने ही बनाया है और उसमे मन भी बनाया है.मन को सामाजिक नियम-क़ानून बनाकर दबाने से वो विकृत हो रहा है.

आदमी जितना क्रूर हो सकता है,वैसा पशु नहीं हो सकता.येक आदमी दूसरे को ज़िंदा जला सकता है.आज ही येक गावं में कुछ लोगों द्वारा येक औरत को ज़िंदा जला देने का समाचार आया है.औरत को डायन या जादू-टोना करने वाली समझ उसके ही रिश्तेदारों ने उसे पहले ईंटों और डंडों से खूब मारा-पीटा और फिर उसे ज़िंदा जला दिया.कितनी क्रूर घटना है !इस तरह क्रूर तो पशु नहीं हो सकते.
कहीं आदमी से पशु ही श्रेष्ठ तो नहीं ? खाली सुख सुविधायुक्त जीवन जीने के कारण आदमी को पशु से श्रेष्ठ समझना क्या उचित है ?

5 comments:

  1. one of the most fundamental differences between a human and other animal species is that of the fifth element or the aakaash tatwa, that human race is bestowed with different levels of its intensity. Animals spend a life that is an 'effect' of some of their previous 'causes', and for a lack of the 'fifth element', or the 'buddhi vivek' that they are not offered by the Lord's Grace, are forgiven for what we see as their killings, and other sins. But humans being blessed with such faculties cant be forgiven, and face the boot accordingly. This is one of the subtliest differences that we as a human being should acknowledge, and practice in our lives. Thank you.

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  2. सच है, हैवानियत के मामले में अब तक कोई पशु इंसान की हद तक नहीं गिर सका है.

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  3. Thanks for above comments.
    @Anonymous- My guru Osho also says that it is only man who may become enlightened.It`s true,but 99.99 percent people live as animals,so i thought,it may be ignored in an expression of my feelings.

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  4. its not a question...
    its a statement...its a fact....
    -that man is the most cruel species made by God!!!

    very nice article..
    regards.

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  5. बढ़िया पोस्ट।

    आज ही कहीं पढ़ा है...

    पशु होने से अच्छा तो मैं पंछी होता।

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